उधम सिंह नगर जनपद में भूजल स्तर में लगातार हो रही गिरावट को देखते हुए प्रशासन ने ग्रीष्मकालीन यानी गर्मी के मौसम में होने वाली धान की खेती पर रोक लगाने का फैसला किया है। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया ने संकेत दिए हैं कि एक फरवरी से 30 अप्रैल तक लागू रहने वाला यह प्रतिबंध पूरे तराई क्षेत्र में बढ़ाया जा सकता है। लोकल 18 की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल किसानों को ग्रीष्मकालीन धान की खेती करने की कोई छूट नहीं दी जाएगी।
नर्सरी, बुआई और रोपाई पर एक साथ रोक
जिलाधिकारी के मुताबिक इस अवधि में धान की नर्सरी तैयार करने, बुआई और रोपाई, तीनों पर पाबंदी रहेगी। उन्होंने साफ किया कि यह रोक तराई क्षेत्र के दूसरे हिस्सों, जैसे नैनीताल और हरिद्वार के कुछ इलाकों में भी लगाई जा सकती है। प्रशासन का कहना है कि यह फैसला कृषि वैज्ञानिकों और किसान संगठनों से सलाह-मशविरा करने के बाद लिया जा रहा है।
करीब 22 हजार हेक्टेयर में होती है बुआई
जनपद में आमतौर पर करीब 22 हजार हेक्टेयर जमीन पर गर्मी का धान बोया जाता है। यहां ज्यादातर किसान एक से दो हेक्टेयर की छोटी जोत पर खेती करते हैं, इसलिए इस फैसले का असर उनकी आमदनी पर सीधा पड़ेगा। अनुमान है कि रोक से करीब 150 करोड़ रुपये की फसल दांव पर लग जाएगी और लगभग 15 हजार किसान प्रभावित होंगे।
दस साल में 70 फीट गिरा भूजल
अधिकारियों के मुताबिक पिछले दस सालों में जिले में भूजल स्तर करीब 70 फीट तक गिर चुका है। जसपुर और काशीपुर जैसे इलाके पहले ही गंभीर श्रेणी में आ चुके हैं। प्रशासन मानता है कि धान की खेती भूजल के अत्यधिक दोहन की सबसे बड़ी वजह है और आने वाले समय में पानी बचाने के लिए यह कदम जरूरी है।
किसानों की चिंता बढ़ी
धान उत्पादक किसानों का कहना है कि वे वर्षों से ग्रीष्मकालीन धान की खेती करते आ रहे हैं, जिससे उन्हें साल में एक अतिरिक्त फसल का लाभ मिलता है। किसानों ने कहा कि प्रतिबंध लगने पर उनकी आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ेगा। इसी वजह से वे प्रशासन के फैसले का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
2024 में हटाया गया था प्रतिबंध
वर्ष 2024 में भी प्रशासन ने ग्रीष्मकालीन धान की खेती पर प्रतिबंध लगाया था, लेकिन बाद में किसानों के अनुरोध पर इसे अस्थायी रूप से हटा लिया गया था। इस बार प्रशासन भूजल संरक्षण को लेकर ज्यादा सख्त रुख अपनाने के मूड में नजर आ रहा है। हालांकि अभी तक इस संबंध में कोई औपचारिक आदेश जारी नहीं किया गया है।
कम पानी वाली फसलों पर जोर
प्रशासन ने किसानों से सहयोग की अपील करते हुए कहा है कि यह कदम भविष्य में पानी बचाने के लिए जरूरी है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि बेमौसमी धान की जगह कम पानी वाली दलहनी और तिलहनी फसलें अपनाकर किसान अपनी आय बनाए रख सकते हैं और जमीन की उर्वरता भी बनी रह सकती है। प्रशासन के मुताबिक यह निर्णय लंबे समय में तराई के किसानों और भूजल संरक्षण, दोनों के लिए फायदेमंद साबित होगा।