चमोली। उत्तराखंड के पहाड़ी कस्बों में भू-धंसाव को लेकर चिंता एक बार फिर गहराई है। सितंबर 2025 की शुरुआत में भारी बारिश के बाद जोशीमठ के करीब 32 घरों में दरारें आने की बात नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट में कही गई थी, जिससे कस्बे में फिर हलचल मच गई थी। दैनिक भास्कर की 2 सितंबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक चमोली के नंदानगर में जमीन धंसने के डर से 34 परिवारों ने घर छोड़ दिए थे और बाजार खाली पड़ गया था। जोशीमठ जैसे बड़े संकट के बाद यह तस्वीर सवाल उठाती है कि पहाड़ी कस्बों में अनियोजित निर्माण की कीमत क्या फिर चुकाई जा रही है।
1976 की चेतावनी से 2023 के संकट तक
जोशीमठ का यह संघर्ष नया नहीं है। चमोली जिले का यह कस्बा करीब 1,890 मीटर की ऊंचाई पर पुराने भूस्खलन के मलबे पर बसा है और भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील जोन-5 में आता है। बद्रीनाथ, औली, वैली ऑफ फ्लावर्स और हेमकुंड साहिब के रास्ते यहीं से जुड़ते हैं और सर्दियों में बद्रीनाथ की विंटर सीट भी यहीं है, इसलिए दशकों से यहां निर्माण और आबादी लगातार बढ़ती रही। सन 1976 में गठित मिश्रा समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा था कि जोशीमठ भूस्खलन के मलबे पर टिका है, पानी का रिसाव और जल निकासी में गड़बड़ी जमीन को कमजोर करती है, इसलिए यहां भारी निर्माण कार्यों पर पाबंदी लगानी चाहिए। यह चेतावनी तब कई अखबारी रिपोर्ट्स में उठाई गई थी, पर दशकों तक ढलानों पर बिना वैज्ञानिक आकलन के इमारतें, होटल और सड़कें बनती रहीं।
जनवरी 2023 में यही डर हकीकत बन गया, जब अचानक सड़कों और मकानों में दरारें आने लगीं। सैकड़ों परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया, खतरनाक घोषित कई इमारतों को गिराना पड़ा और औली रोपवे का संचालन भी उसी दौर में बंद कर दिया गया। जिला प्रशासन ने जोशीमठ के लिए अलग बुलेटिन जारी करने की व्यवस्था भी रखी; चमोली जिले की वेबसाइट पर जोशीमठ बुलेटिन का अंतिम अंक 23 अक्टूबर 2023 का दर्ज है। अक्टूबर 2024 में गढ़वाल आयुक्त और आपदा सचिव की बैठक के बाद जोशीमठ में आपदा पुनर्वास कार्यालय स्थापित किए जाने की रिपोर्ट आई थी।
कारण वही, सवाल वही
आपदा प्रबंधन और भू-विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञ बताते रहे हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण, जल निकासी की खराब व्यवस्था, ढलानों पर बढ़ता दबाव और कस्बों की धारण क्षमता से ज्यादा आबादी भू-धंसाव के बड़े कारण हैं। जोशीमठ में पानी का जगह-जगह रिसाव और टूटी नालियों से जमीन के भीतर खोखलापन बढ़ने की बात भी वैज्ञानिकों ने उठाई थी। जलवायु परिवर्तन के चलते अचानक भारी बारिश की घटनाएं बढ़ने की आशंका से यह समस्या और गंभीर हो सकती है; नंदानगर जैसे मामले इसी आशंका को दोहराते हैं। इसलिए निर्माण नियमों की सख्ती से पालना और लगातार वैज्ञानिक निगरानी को ही स्थायी समाधान बताया जाता रहा है।
जमीनी स्तर पर सवाल अब भी मुआवजे और पुनर्वास के हैं। जोशीमठ में कई परिवार पुराने घरों में लौटने से हिचक रहे हैं, तो कुछ नई जगह बसना शुरू कर चुके हैं। औली रोपवे जनवरी 2023 से बंद है, जिससे पर्यटन कारोबार और होटल व्यवसायी प्रभावित हुए हैं। दरारों से जूझ चुके लोगों का कहना है कि जब तक जमीन की स्थिरता की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं होती, वे घरों की हिफाजत को लेकर आश्वस्त नहीं हो सकते। पहाड़ी कस्बों के भविष्य के लिए जरूरी है कि 1976 की चेतावनी और 2023 के संकट के सबक आखिरकार गंभीरता से अपनाए जाएं।