पौड़ी। जनपद के युवा पारस बिष्ट ने भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट का पद हासिल कर पूरे क्षेत्र का नाम रोशन कर दिया है। खबर आते ही उनके परिजनों, पड़ोसियों और क्षेत्र के शुभचिंतकों में खुशी की लहर दौड़ गई। मिठाई बंटी, तालियां बजीं और यही सवाल दोहराया जाने लगा कि जिस युवा को लोग बचपन से देखते आए हैं, वही अब कंधे पर सितारे लगाए देशसेवा की जिम्मेदारी संभालेगा।
सेना में अधिकारी बनना आसान बात नहीं है। इसके लिए लिखित परीक्षा, साक्षात्कार, मनोवैज्ञानिक जांच और शारीरिक परीक्षण — कई स्तरों को पार करना पड़ता है। इतना ही नहीं, अकादमी के प्रशिक्षण में हर दिन की परीक्षा होती है। इस पूरी यात्रा में परिवार का सहयोग, गांव का माहौल और खुद का अनुशासन ही युवा को अंतिम दौर तक ले जाता है। पारस की सफलता को इसी लगन का नतीजा माना जा रहा है। अकादमी के दौरान सुबह से रात तक चलने वाला शेड्यूल युवा को निखारता है — शारीरिक कसरत, शस्त्र प्रशिक्षण, नेतृत्व के अभ्यास और पढ़ाई साथ-साथ चलती है। कमीशन मिलने के बाद भी जिम्मेदारियों का सिलसिला रुकता नहीं; लेफ्टिनेंट के पद से ही सेना में अफसर की लंबी यात्रा शुरू होती है।
पहाड़ की सेना-परंपरा
उत्तराखंड को ‘वीरों की भूमि’ कहा जाता है और यह कहना मात्र की बात नहीं है। गढ़वाल राइफल्स और कुमाऊं रेजिमेंट की जड़ें इसी पहाड़ी मिट्टी में हैं। स्वतंत्रता से पहले से यहां के युवा देश की सीमाओं पर डटे रहे हैं और घर-परिवार ने उनकी यादों के सहारे लंबे इंतजार की परंपरा निभाई है। हर बार जब कोई बेटा अफसर बनकर लौटता है, तो पूरा गांव उसमें अपनी जीत देखता है।
पहाड़ की अर्थव्यवस्था से भी सेना गहरे जुड़ी रही है। सैनिकों की आय घर-परिवार की बुनियाद बनी रही है, सेवानिवृत्त जवान गांवों के सामाजिक जीवन की रीढ़ बने रहते हैं और शहीदों के परिवारों का सम्मान पूरा क्षेत्र करता है। इसी वजह से यहां सेना में भर्ती को सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि सम्मान की पहचान माना जाता है।
अफसर बनने के रास्ते
एनडीए के जरिए स्कूली दौर में ही प्रवेश मिल जाता है, तो ग्रेजुएशन के बाद सीडीएस की परीक्षा पार कर भी कमीशन मिल सकता है। इंजीनियरिंग के छात्रों के लिए टेक्निकल ग्रेजुएट कोर्स और एनसीसी स्पेशल एंट्री जैसे रास्ते भी हैं। पहाड़ के कई संस्थानों में अब सेना-भर्ती की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थान भी चल रहे हैं। साथ ही शारीरिक फिटनेस और अनुशासन की तैयारी भी किताबी पढ़ाई जितनी ही जरूरी है। कई गांवों में पुराने सैनिक बच्चों को दौड़, व्यायाम और अनुशासन की सलाह देना अपना धर्म मानते हैं। पारस की उपलब्धि से यह साफ होता है कि संसाधन चाहे जैसे हों, नियमित मेहनत ही असली शर्त है।
क्षेत्र में खुशी और उम्मीदें
चयन की खबर से क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल रहा। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसी सफलताएं आने वाली पीढ़ी को संदेश देती हैं कि पहाड़ से बाहर जाना जरूरी नहीं, लेकिन सपने बड़े रखना जरूरी है। परिवार के सदस्यों ने युवा अधिकारी के उज्ज्वल करियर और लंबी देशसेवा की कामना की है। ऐसी उपलब्धियां आपसी सीढ़ी भी बनती हैं — एक गांव का बेटा अफसर बनता है, तो आसपास के गांवों के युवा भी फौजी बनने का सपना देखने लगते हैं, और यही चक्र पीढ़ियों तक चलता है। ऐसे ही एक-एक चयन मिलकर पहाड़ को ‘वीरों की भूमि’ का दर्जा देते रहते हैं।