उत्तरकाशी जिले की स्वतंत्री बधाणी को लोग ‘रेड राइस लेडी’ के नाम से जानते हैं। वह कई वर्षों से पारंपरिक लाल धान और अन्य पारंपरिक अनाजों को बचाने में जुटी हैं। उनकी मेहनत से लुप्त हो रही कई प्रजातियां फिर से खेतों में लौट रही हैं। इस काम ने उन्हें दूर-दूर तक पहचान दिलाई है। आसपास के किसान उनसे बीज और खेती के तरीके सीख रहे हैं। उनका प्रयास पहाड़ की परंपरागत खेती को नई उम्मीद दे रहा है।
पारंपरिक खेती को बचाने की कोशिश
पहाड़ में पहले लाल धान और अन्य पारंपरिक अनाज घर-घर उगाए जाते थे। धीरे-धीरे इनकी खेती घटने लगी। कई प्रजातियां लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गईं। किसानों ने दूसरी फसलों की ओर रुख किया। स्वतंत्री बधाणी ने इन प्रजातियों को संजोकर रखना शुरू किया। उनका यह अभियान आज कई गांवों तक पहुंच गया है।
लाल धान का संरक्षण
लाल धान की अलग पहचान और महत्व है। इसे पहाड़ी खेतों के लिए उपयुक्त माना जाता है। इसकी खेती में पानी की कम जरूरत पड़ती है। परंपरागत बीज होने के कारण इसमें लागत भी कम आती है। संरक्षण की कोशिशों से इसकी बुवाई फिर बढ़ी है। कई किसान अब इसे प्राथमिकता दे रहे हैं।
बीज बैंक की पहल
पारंपरिक बीजों को सहेजने के लिए बीज बैंक की पहल हुई। इसमें लाल धान समेत अन्य देशी बीज रखे जाते हैं। जरूरत के समय किसानों को बीज उपलब्ध कराए जाते हैं। इससे पारंपरिक किस्में सुरक्षित रहती हैं। बीज के आदान-प्रदान से किसानों का आपसी तालमेल भी बढ़ा है।
किसानों को जोड़ा
स्वतंत्री बधाणी ने किसानों को समूह में जोड़ा। उन्हें पारंपरिक खेती के फायदे समझाए गए। बीज चयन और भंडारण की जानकारी दी गई। कई गांवों में प्रदर्शन खेत भी बनाए गए। इससे यह अभियान व्यापक रूप ले रहा है। किसानों का भरोसा बढ़ने से भागीदारी बढ़ी है।
मंडुआ और अन्य अनाज
लाल धान के साथ मंडुआ और अन्य पारंपरिक अनाजों पर भी जोर है। इन्हें पौष्टिक माना जाता है। पहाड़ी इलाकों में इनकी खेती पुरानी परंपरा रही है। बाजार में इनकी मांग बढ़ने से किसानों को अच्छा दाम मिल रहा है। इससे पारंपरिक फसलों को नया आधार मिला है।
स्वास्थ्य के लिहाज से लाभ
पारंपरिक अनाजों को स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद बताया जाता है। इनमें पोषक तत्व अधिक होते हैं। लाल धान के चावल की मांग शहरों में भी बढ़ी है। लोग इसे देशी उत्पाद के रूप में पसंद कर रहे हैं। इससे किसानों को सीधा फायदा पहुंच रहा है।
महिलाओं की भागीदारी
इस अभियान में महिलाओं की भागीदारी अहम रही है। वे बीज संभालने और खेती में आगे आईं। समूह बनाकर काम करने से उनका आत्मविश्वास बढ़ा। उन्होंने बाजार तक पहुंचने की कोशिशें भी तेज कीं। महिलाओं के जुड़ाव से यह मुहिम मजबूत हुई है।
पहचान और सम्मान
पारंपरिक खेती के क्षेत्र में किए काम से उन्हें पहचान मिली। आसपास के जिलों से भी लोग सीखने आते हैं। कई संस्थाएं इस काम को आगे बढ़ा रही हैं। उनकी कोशिशों को किसान सम्मान की नजर से देखते हैं। इससे अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिल रही है।
आगे की योजना
आगे और गांवों को जोड़ने की योजना है। पारंपरिक बीजों का दायरा बढ़ाने पर जोर रहेगा। प्रसंस्करण और पैकेजिंग पर भी काम हो रहा है। इससे उत्पाद को बाजार में ज्यादा दाम मिलने की उम्मीद है। किसानों की आय बढ़ाने पर ध्यान रहेगा।
पहाड़ के लिए उम्मीद
इस तरह की कोशिशें पहाड़ की खेती के लिए उम्मीद बन रही हैं। पारंपरिक बीज टिके रहेंगे तो परंपरा भी जीवित रहेगी। किसानों को इससे रोजगार और पहचान दोनों मिलने की उम्मीद है। युवाओं को भी खेती से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। संरक्षण का यह काम धीमा लेकिन ठोस बदलाव दे रहा है।