बागेश्वर जिले में पहाड़ों का लोकप्रिय जंगली फल काफल अब पूरी तरह पक चुका है। काफल का सीजन शुरू होते ही स्थानीय लोगों और पर्यटकों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। इन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों, जंगलों और मुख्य सड़कों के किनारे लोग काफल बेचते नजर आ रहे हैं।
क्या है काफल
काफल का वैज्ञानिक नाम माइरिका एस्कुलेंटा है। गहरे लाल और काले रंग का यह छोटा फल स्वाद में खट्टा-मीठा होता है। गर्मियों में यह ताजगी का एहसास कराता है और पहाड़ी इलाकों में इसे बड़े चाव से खाया जाता है।
ऐसे खाया जाता है काफल
पहाड़ों में इसे विशेष रूप से पहाड़ी नमक, हरी मिर्च और सरसों के तेल के साथ मिलाकर खाया जाता है। इससे इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है। स्थानीय बाजारों में काफल की अच्छी मांग रहती है।
कोई व्यावसायिक बागान नहीं
काफल का कोई व्यावसायिक बागान नहीं होता, बल्कि यह केवल प्राकृतिक रूप से जंगलों के बीच ही पनपता है। यह पूरी तरह प्राकृतिक वातावरण में उगता है। इसके पेड़ ऊंचे और घने होते हैं।
फल तोड़ना है जोखिम भरा काम
ऊंचे और घने पेड़ों पर चढ़कर काफल तोड़ना मेहनत भरा और जोखिमपूर्ण काम माना जाता है। सुबह-सुबह ग्रामीण और युवा जंगलों में जाकर सावधानीपूर्वक इन फलों को इकट्ठा करते हैं। इसके बाद इन्हें बाजारों और सड़क किनारे बेचा जाता है।
ग्रामीणों के लिए आमदनी का जरिया
काफल बेचकर स्थानीय लोग अच्छी आमदनी अर्जित करते हैं। काफल सीजन के दौरान पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी अच्छी मांग रहती है। पर्यटक भी इसे बड़े चाव से खरीदते हैं, जिससे ग्रामीणों को फायदा मिलता है।
सेहत के लिए भी लाभकारी
स्वाद के साथ-साथ काफल सेहत के लिए भी लाभकारी माना जाता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह पाचन तंत्र को बेहतर बनाने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और मानसिक तनाव कम करने में सहायक माना जाता है।
पारंपरिक उपचारों में भी उपयोग
काफल की छाल और पत्तियों का उपयोग पारंपरिक घरेलू उपचारों में भी किया जाता रहा है। पहाड़ी समाज में इसे खास पहचान मिली हुई है। इससे यह फल सिर्फ खाने तक सीमित नहीं रहता।
मौसम का हाल
इस बीच मौसम विभाग के अनुसार देहरादून में उमस भरी गर्मी बनी हुई है। मैदानी जिलों में तापमान और बढ़ने का अनुमान है। पर्वतीय जिलों में कहीं-कहीं हल्की बारिश और बादल छाए रह सकते हैं।
किसानों के लिए सलाह
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों और बागवानों से मौसम के पूर्वानुमान पर नजर रखने की अपील की है। बदलते मौसम में फसलों और फलों की सुरक्षा के लिए जरूरी उपाय करने की सलाह दी गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि काफल जैसे फल पहाड़ की अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं।
मानसून की चाल और बढ़ेगी गर्मी
दक्षिण-पश्चिम मानसून इस बार सामान्य समय से पहले उत्तराखंड पहुंच सकता है। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक मानसून केरल पहुंचने के बाद करीब बीस दिनों में राज्य तक पहुंचता है, इसलिए जून के पहले पखवाड़े में पहाड़ों में बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। तब तक राजधानी देहरादून समेत मैदानी इलाकों में तापमान दो से चार डिग्री तक और चढ़ सकता है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अभी भी हल्की बर्फबारी के आसार बने हुए हैं।