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नैनीताल

सार्वजनिक रास्ते पर आर्मी गेट नहीं बना सकते, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रुड़की बीईजी केंद्र की याचिका खारिज की

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रुड़की के भंगेरी गांव के सार्वजनिक मार्ग पर लगे गेट को लेकर बीईजी केंद्र की याचिका खारिज कर ग्रामीणों को बड़ी राहत दी।

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रुड़की छावनी क्षेत्र स्थित बंगाल इंजीनियरिंग ग्रुप एंड सेंटर यानी बीईजी केंद्र की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें गेट विवाद को लेकर ग्रामीणों के खिलाफ कार्रवाई को चुनौती दी गई थी। रुड़की हरिद्वार जनपद का हिस्सा है और यहां छावनी के पास बसे भंगेरी गांव के निवासियों को अदालत के इस फैसले से बड़ी राहत मिली है। एटीवी भारत के मुताबिक मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने की।

दशकों पुराना रास्ते का विवाद

भंगेरी गांव के निवासियों और बीईजी केंद्र के बीच सड़क को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। छावनी से निकलने वाले रास्ते पर बीईजी ने गेट लगा दिया था, जिससे गांव के लोगों का आवागमन बाधित हो गया था। एनपीआर भारत की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीणों ने इस गेट का विरोध किया और मामला प्रशासन तक पहुंचा।

एसडीएम ने दिया था गेट हटाने का आदेश

रुड़की के उप जिलाधिकारी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 के तहत कार्रवाई करते हुए 26 जुलाई 2022 को बीईजी को सार्वजनिक रास्ते से गेट हटाने का निर्देश दिया था। इसके बाद हरिद्वार के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने भी 30 मई 2023 को इसी तर्ज पर फैसला सुनाया था। इन दोनों कार्यों को ही चुनौती देने के लिए बीईजी केंद्र ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

सेना का दावा था डिफेंस लैंड का

बीईजी केंद्र का दावा था कि पूरी विवादित भूमि ए-1 डिफेंस लैंड का हिस्सा है, जिसका उपयोग सैन्य प्रशिक्षण के लिए होता है और नागरिकों का प्रवेश वर्जित है। उसकी ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि सिविल कोर्ट पहले ही ग्रामीणों के भूमि अधिकारों को खारिज कर चुका है और एसडीएम को धारा 133 के तहत स्वामित्व का मुद्दा दोबारा खोलने का अधिकार नहीं है। यह भी कहा गया कि ग्रामीणों को दो वैकल्पिक सड़कें पहले से उपलब्ध कराई जा चुकी हैं।

राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है गौहर रास्ता

अदालत ने माना कि विवादित खसरा संख्या 710, जिसका रकबा 0.3590 हेक्टेयर है, राजस्व रिकॉर्ड में गौहर रास्ता यानी सार्वजनिक मार्ग के रूप में दर्ज है। एटीवी भारत के अनुसार यह दर्ज उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम 1950 की धारा 132 के तहत हुआ था और इसका वर्गीकरण कभी नहीं बदला गया। राज्य और ग्रामीणों के वकीलों ने भी इसी बात पर जोर दिया था।

अधिग्रहित भूमि से बाहर है विवादित प्लॉट

न्यायमूर्ति पुरोहित ने दोनों पक्षों के तर्कों और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के बाद माना कि सेना यह साबित करने में नाकाम रही कि उसने यह भूमि वैध प्रक्रिया से अधिग्रहित की है या इस पर नागरिक आवागमन से कोई तत्काल सुरक्षा खतरा पैदा होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवादित खसरा कुल 648.90 एकड़ अधिग्रहित रक्षा भूमि के बाहर स्थित है। पहले दायर मुकदमे कल्लू सिंह बनाम भारत संघ का संबंध जल नहर मार्ग से था, जिसका इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं है।

ग्रामीणों को राहत

अदालत के मुताबिक एसडीएम ने सार्वजनिक मार्ग पर निर्बाध पहुंच सुनिश्चित करने के लिए अपने क्षेत्राधिकार के भीतर ही कार्य किया था। इस आधार पर हाईकोर्ट ने बीईजी केंद्र की याचिका खारिज कर दी और ग्रामीणों के पक्ष में फैसला सुनाया। फैसले के बाद भंगेरी गांव के लोगों को उम्मीद जागी है कि सार्वजनिक रास्ते पर उनकी आवाजाही पहले की तरह बिना रुकावट बहाल होगी।