अल्मोड़ा। सांस्कृतिक नगरी के ऐतिहासिक नंदा देवी मंदिर प्रांगण में इन दिनों कुमाऊं की सबसे पुरानी मानी जाने वाली रामलीला मंचित हो रही है। ईटीवी भारत की रिपोर्ट के मुताबिक गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस पर आधारित इस रामलीला का 165 साल से लगातार सफल मंचन हो रहा है। नवरात्र के दिनों में देर रात तक चलने वाला यह आयोजन पूरे नगर में भक्तिमय माहौल बनाए हुए है।
शुरुआत हुई थी बद्रेश्वर मंदिर से
रिपोर्ट के मुताबिक कुमाऊं में रामलीला का मंचन सबसे पहले अल्मोड़ा से शुरू हुआ और माना जाता है कि पहली रामलीला 1860 में नगर के बद्रेश्वर मंदिर से प्रारंभ हुई, जिसका श्रेय तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर स्वर्गीय देवीदत्त जोशी को जाता है। इसके बाद यह परंपरा नैनीताल, बागेश्वर और पिथौरागढ़ तक पहुंची। बद्रेश्वर से मंचित होने वाली यह रामलीला आगे चलकर त्युनरा मोहल्ले के त्रिपुरा सुंदरी मंदिर पहुंची और फिर नंदा देवी प्रांगण में आ गई, जहां से यह आज तक बिना रुके चली आ रही है।
अब नवरात्र के दिनों में नंदा देवी प्रांगण के अलावा शहर के हुक्का क्लब, एनडीडी, कर्नाटक खोला, राजपुरा, सरकार की आली और खत्याड़ी समेत कई मोहल्लों में रामलीला मंचित होती है। स्थानीय कलाकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इससे जुड़े हुए हैं।
- कुमाऊं की पहली रामलीला 1860 में बद्रेश्वर मंदिर से शुरू हुई थी
- अब नंदा देवी प्रांगण समेत कई मोहल्लों में होता है मंचन
- महिला पात्र अब महिलाएं ही निभा रही हैं
- आयोजकों ने उठाई संरक्षण और आर्थिक सहायता की मांग
उदय शंकर की छाया-छवियों का जिक्र
इस परंपरा के इतिहास में नृत्य सम्राट पंडित उदय शंकर का नाम खास तौर पर दर्ज है। रिपोर्ट के मुताबिक 1940-41 के दौरान उन्होंने अल्मोड़ा में छाया चित्रों के जरिए रामलीला में नवीनता लाने की कोशिश की। उनकी प्रस्तुति यहां की परंपरागत शैली से काफी अलग थी, लेकिन उनके छायाचित्रों और नृत्य की छटा ने अल्मोड़ा की रामलीला पर गहरी छाप छोड़ी।
कलाकारों से जुड़ी जीवंत परंपरा
इस बार नंदा देवी रामलीला में दशरथ की भूमिका निभा रहे नवीन बिष्ट के मुताबिक वे पिछले 25 साल से इसी मंच से जुड़े हैं और परशुराम समेत कई पात्र कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि यहां आज भी रामलीला पूरी तरह परंपरागत तरीकों से होती है और अब महिला पात्र भी महिलाएं ही निभा रही हैं। कैकेयी का किरदार निभा रहीं पुष्पा रौतेला पिछले सात वर्षों से इसी भूमिका से जुड़ी हैं। उनके मुताबिक रामलीला सिर्फ मंचन नहीं, बड़ों के सम्मान, भाई-भाई में प्रेम और माता-पिता की आज्ञा के मूल्य समझाने वाला बड़ा संदेश है।
विरासत बचाने की मांग
आयोजकों और कलाकारों का कहना है कि इतनी लंबी परंपरा को जीवित रखना आसान नहीं है। धन की कमी के साथ मंच और साज-सामान जैसी दिक्कतें हर साल सामने आती हैं। इसलिए रामलीला कमेटियों ने सरकार और प्रशासन से आर्थिक सहायता और संरक्षण की मांग की है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस विरासत को वैसे ही आगे बढ़ा सकें।
शहरवासियों के लिए यह आयोजन महज धार्मिक समारोह नहीं, बल्कि लोक संस्कृति, संगीत और रंगमंच की जीवंत पहचान है। शारदीय नवरात्र के इन दिनों नंदा देवी का प्रांगण इस 165 साल पुरानी परंपरा का सबसे बड़ा गवाह बन जाता है।