टिहरी। जिले के दूरस्थ गंगी गांव में पारंपरिक भेड़ कौथिग का आयोजन हुआ, जिसमें पशुपालक अपनी भेड़-बकरियों को लेकर पहुंचे और उन्हें सोमेश्वर देवता के चरणों में परिक्रमा कराई गई। खबर पहले ही आसपास के गांवों में पहुंच चुकी थी, इसलिए आयोजन स्थल पर गांव के लोग बड़ी संख्या में जुटे और पूरा माहौल उत्सव जैसा रहा।
कौथिग पहाड़ का पारंपरिक उत्सव है, जिसमें समुदाय एक साथ जुटता है — कहीं यह मेले के रूप में मनाया जाता है तो कहीं पर्व के रूप में। भेड़ कौथिग इसका पशुपालकों के लिए खास रूप है। इसमें लोग अपने पशुओं को सजाकर लाते हैं और उन्हें देवता के चरणों तक ले जाते हैं। आयोजन के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम, पारंपरिक खेल और स्थानीय व्यंजनों की चर्चा भी जुड़ती है। यह उत्सव पशुपालकों की मेहनत और पशुधन की अहमियत को दर्शाने वाला अवसर माना जाता है। ऐसे अवसरों पर बड़े-बुजुर्ग अपनी यादें भी सुनाते हैं कि कैसे दौर-दौरे से भेड़ें और बकरियां घर की गरिमा का हिस्सा रही हैं।
पशुपालन से जुड़ी आजीविका
पहाड़ में पशुपालन खेती के साथ आजीविका का बड़ा साधन रहा है। ऊन, दूध और पशुधन से स्थानीय अर्थव्यवस्था जुड़ी है और खेतों के लिए खाद भी इसी से जुटती है। दूर-दराज के गांवों में जहां सड़क और बाजार दूर हैं, वहां भेड़-बकरियां परिवार की अलग से आजीविका भी बन जाती हैं। जरूरत के समय में पशु बेचकर नकदी जुटाने की परंपरा भी पहाड़ में पुरानी रही है। ऐसे में पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी देखभाल को लेकर पूरा गांव सजग रहता है और पशुधन की बढ़ोतरी को समृद्धि का लक्षण माना जाता है।
परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने का जरिया
ऐसे उत्सव सिर्फ मेले भर नहीं हैं। इनके जरिए बच्चों को पशुधन की अहमियत समझाई जाती है और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुंचती है। सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के आयोजन गांवों की सामूहिक जीवनशैली को जीवित रखते हैं। जब लोग एक साथ जुटते हैं, तो आपसी जुड़ाव भी मजबूत होता है और गांव की सक्रियता भी। बच्चे यहां लोकगीत सुनते हैं, परंपरागत खेल खेलते हैं और अपनी संस्कृति से जुड़ाव महसूस करते हैं। यही वजह है कि इन उत्सवों को पलायन रोकने में भी मददगार माना जाता है।
गांव में उत्सव का माहौल
गंगी जैसे दूरस्थ गांवों में ऐसे आयोजन खास महत्व रखते हैं, क्योंकि यहां रोज की जिंदगी में बड़े जमावड़े कम ही होते हैं। देवता के चरणों में पशुओं की परिक्रमा की परंपरा आस्था और पशुपालन के गहरे रिश्ते को दिखाती है — पहाड़ के लोग अपने पशुओं को परिवार का हिस्सा मानते हैं। उत्सव के साथ लोकगीतों की महफिल और स्थानीय व्यंजनों की चर्चा भी जुड़ी रहती है, जिससे पूरा दिन एक त्योहार जैसा बीत जाता है। पहाड़ से शहरों में बसे रिश्तेदार भी ऐसे अवसरों पर गांव का रुख करते हैं, जिससे घर-आंगन फिर से गूंज उठता है। आयोजकों की उम्मीद है कि इस तरह के उत्सव आगे भी उसी श्रद्धा और जोश के साथ होते रहेंगे, ताकि पहाड़ की यह पहचान पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रहे।