शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026 देहरादून, उत्तराखंड
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उत्तराखंड में मानसून विदा: इस साल औसत से 22 प्रतिशत अधिक बारिश

उत्तराखंड से मानसून विदा हो चुका है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक इस सीजन राज्य में औसत से 22 फीसदी अधिक बारिश दर्ज हुई और असर साफ देखा गया।

देहरादून। उत्तराखंड से मानसून विदा हो चुका है और इस बार राज्य में सामान्य से 22 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक पूरे सीजन में राज्य के अधिकांश हिस्सों में औसत से ज्यादा वर्षा हुई। इस ज्यादा बारिश ने एक तरफ जलाशयों और भूजल को समृद्ध किया, वहीं दूसरी तरफ कई जिलों में नदियां उफान पर रहीं, भूस्खलन हुए और सड़क आवाजाही बार-बार ठप हुई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मानसून की विदाई के साथ ही जिलेवार नुकसान के आकलन का काम भी तेज हो गया है।

सीजन का सफर

इस साल मानसून की रफ्तार शुरुआत से ही तेज रही। जून में प्रवेश के बाद जुलाई और अगस्त में बारिश के दौर लगातार चलते रहे और सितंबर के आखिरी पखवाड़े में मानसून ने राज्य को विदा दी। मौसम विज्ञान के लिहाज से पूरे सीजन में औसत से 22 प्रतिशत अधिक वर्षा बताई गई है, जो पहाड़ी राज्य के लिए काफी बड़ी चढ़ाई है। ऐसा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड में मानसून का पैटर्न बार-बार बदलता देखा गया है — कई बार कम बारिश सूखे की आशंका जगाती है, तो कई बार एकदम भरपूर बारिश आपदा की तस्वीर खड़ी कर देती है।

किसानों के लिए दोधारी तस्वीर

ज्यादा बारिश किसानों के लिए राहत और नुकसान, दोनों लेकर आई। खेतों में नमी की अच्छी उपलब्धता से रबी की बुवाई की तैयारी को फायदा पहुंचने की उम्मीद है। लेकिन पहाड़ी इलाकों में धान, मंडुवा और अन्य फसलें तेज बारिश और बहाव की चपेट में भी आईं। कई जगह खेतों में पानी भर गया और खड़ी फसल बह गई। आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक बारिश और भूस्खलन से कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा प्रभावित हुआ है, जिसका जिलेवार आकलन चल रहा है।

आपदा की मुख्य तस्वीर

इस सीजन में सबसे ज्यादा परेशानी भूस्खलन, बादल फटने और सड़कों के बह जाने से रही।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग और ग्रामीण सड़कें कई जगह कई-कई दिन बंद रहीं
  • बादल फटने से कई इलाकों में मकान और पशुधन को नुकसान पहुंचा
  • पेयजल की लाइनें और बिजली का ढांचा क्षतिग्रस्त हुआ
  • नदियों का जलस्तर बार-बार चेतावनी स्तर के पास पहुंचा

अब मौसम की दिशा

मौसम विभाग के मुताबिक मानसून की विदाई के बाद अब पश्चिमी विक्षोभ की गतिविधि देखी जा सकती है, जिनसे अक्टूबर-नवंबर में ऊंचाई वाले इलाकों में बारिश और बर्फबारी होने की संभावना रहती है। प्रशासन की नजर अब मरम्मत कार्यों पर है, ताकि ठंड के मौसम से पहले क्षतिग्रस्त सड़कों और पेयजल व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सके। आपदा प्रभावित परिवारों की सूची बनाकर उन्हें राहत पहुंचाने का काम भी इसी दौर में तेज करने की बात कही जा रही है।

मायने और असर

पहाड़ के संदर्भ में 22 प्रतिशत अधिक बारिश सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। यह बताता है कि आने वाले महीनों में पानी की उपलब्धता बेहतर रह सकती है और जल शक्ति के स्रोत अच्छी हालत में हैं। लेकिन इसी चढ़ाई का हिसाब टूटी सड़कों, बहे खेतों और प्रभावित परिवारों की सूची से भी लगाना होगा। राज्य सरकार के लिए असली चुनौती अब राहत की चरणबद्ध प्रक्रिया को पूरा करना और अगले सीजन से पहले संवेदनशील ढलानों पर सुरक्षा कार्य तय करना है।