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अल्मोड़ा

उत्तराखंड में होली की अनोखी परंपराएं, उत्तरकाशी में भस्म होली तो हल्द्वानी में खड़ी होली

होली से पहले उत्तराखंड में अलग-अलग लोक परंपराएं नजर आईं। उत्तरकाशी के काशी विश्वनाथ मंदिर में भस्म होली खेली गई, जबकि हल्द्वानी में चंपावत के गांवों ने खड़ी होली खेली।

होली के रंग उत्तराखंड में हर क्षेत्र की अपनी परंपरा के साथ उतरते हैं। रंगों की बौछार से पहले यहां गीत, ढोल और लोक मान्यताओं का दौर चलता है। उत्तरकाशी से लेकर कुमाऊं तक अलग-अलग रीति-रिवाज आज भी जीवित हैं। इसी विविधता से पहाड़ की होली की अलग पहचान बनती है। यह पर्व यहां आस्था और सामूहिकता दोनों का प्रतीक है।

रंगों से पहले भस्म होली

उत्तरकाशी जिले में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर में रंगों से पहले भस्म होली खेली जाती है। यहां पवित्र राख से होली का आयोजन होता है। इस दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। आयोजन देखने दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। मान्यता के चलते यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।

प्रसाद के रूप में मिलती है राख

परंपरा के अनुसार भस्म होली में इस्तेमाल हुई राख प्रसाद के रूप में बांटी जाती है। श्रद्धालु इसे घर ले जाकर पूजा स्थल पर रखते हैं। माना जाता है कि यह राख शुभता और रक्षा का प्रतीक है। इसी आस्था के चलते लोग आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। मंदिर समिति की ओर से पूरी व्यवस्था संभाली जाती है।

हल्द्वानी में खड़ी होली का आयोजन

नैनीताल जिले के हल्द्वानी में चंपावत के करीब बीस गांवों के लोगों ने मिलकर खड़ी होली खेली। यह परंपरा इन गांवों के आपसी जुड़ाव का प्रतीक मानी जाती है। हर साल बड़ी संख्या में लोग एक साथ इकट्ठा होते हैं। आयोजन में पारंपरिक वेशभूषा और लोक वाद्य प्रमुख रहे। पलायन के बाद भी यह जुड़ाव टूटने नहीं दिया गया।

महिलाओं ने गाए होलियार गीत

आयोजन में महिलाओं ने गोल घेरे में खड़े होकर होलियार गीत गाए। ढोल और दमाऊ की थाप पर माहौल उल्लास से भर उठा। पुरुषों ने भी पारंपरिक अंदाज में साथ निभाया। मौके पर आपसी सौहार्द की मिसाल देखने को मिली। गांवों से आए परिवारों ने एक-दूसरे को रंग लगाकर शुभकामनाएं दीं।

खड़ी होली की खासियत

खड़ी होली में रंगों की जगह गीत, संगीत और नृत्य प्रमुख होता है। लोग एक-दूसरे पर रंग डालने के बजाय मिलकर लोकगीत गाते हैं। इसे कुमाऊं की सबसे पुरानी परंपराओं में गिना जाता है। इस अंदाज में मनाई जाने वाली होली का अपना अलग आकर्षण है। नई पीढ़ी भी इसे उत्साह से अपना रही है।

अल्मोड़ा के गांव में नशामुक्त होली

अल्मोड़ा जिले के एक गांव में पिछले पच्चीस सालों से नशामुक्त होली मनाई जाती है। यहां होली के दिन शराब या नशे की कोई छूट नहीं है। त्योहार पूरी तरह जागरूकता और संयम के साथ मनाया जाता है। हर पीढ़ी इस नियम को अपने बच्चों तक पहुंचाती है। ग्रामीण इसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताते हैं।

गौशाला में बंद करने की परंपरा

गांव की परंपरा के मुताबिक शराब पीने वाले व्यक्ति को गौशाला में बंद कर दिया जाता है। इस कड़े नियम ने पूरे गांव को नशे से दूर रखा है। ग्रामीणों का कहना है कि इससे आपसी कलह भी कम हुई है। युवाओं को भी यही अनुशासन सौंपा जाता है। इस प्रयास की चर्चा आसपास के गांवों में भी होती है।

विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश

इन परंपराओं से साफ है कि उत्तराखंड की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है। यह लोक आस्था, अनुशासन और सामूहिकता का प्रतीक है। स्थानीय लोग इन टोक्यों को गर्व से आगे बढ़ा रहे हैं। सांस्कृतिक संस्थाएं भी इन्हें प्रोत्साहित कर रही हैं। यही विरासत पहाड़ की संस्कृति को जीवित रखती है।