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बागेश्वर

बागेश्वर है जड़ी-बूटियों का खजाना, औषधीय पौधों से बढ़ेगी आजीविका

बागेश्वर जिले के ऊंचे इलाकों में जटामांसी, कुटकी जैसी दुर्लभ जड़ी-बूटियां हैं। वन विभाग और जड़ी-बूटी बोर्ड की पहल से खेती और प्रसंस्करण से आजीविका की उम्मीद।

बागेश्वर। उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में बागेश्वर को औषधीय पौधों का घर माना जाता है। वन विभाग के मुताबिक यहां की ऊंचाई और जलवायु ऐसी है कि दुर्लभ जड़ी-बूटियां प्राकृतिक रूप से उगती हैं, जिनकी आयुर्वेदिक दवाओं की दुनिया में लगातार मांग रहती है। स्थानीय स्तर पर जड़ी-बूटियों को इकट्ठा करने वाले परिवारों के लिए यह बरसों से पूरक आमदनी का जरिया रहा है, लेकिन बाजार का बड़ा हिस्सा बिचौलियों के हाथ चला जाता रहा है।

समाचार संस्थाओं की रिपोर्ट्स के मुताबिक जिले के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में जटामांसी, कुटकी, अतीस, ब्रह्मकमल और कीड़ा जड़ी जैसी दुर्लभ औषधीय पौधे पाए जाते हैं। कीड़ा जड़ी के लिए तो कहा जाता है कि इसकी कीमत सोने तक पहुंच जाती है, वहीं जटामांसी और कुटकी का इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाओं में सदियों से होता आ रहा है। ब्रह्मकमल का स्थानीय धार्मिक मान्यताओं से भी गहरा नाता है।

ऊंचाई के साथ बदलती जलवायु की वजह से हिमालय के अलग-अलग ऊंचाई वाले हिस्सों में अलग-अलग पौधे उगते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक इसी विविधता के कारण उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में औषधीय पौधों की दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। दशकों पहले तक गांवों के वैद्य इन्हीं जड़ी-बूटियों से पारंपरिक तरीके से इलाज करते थे और यह ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है।

अब इन पौधों को सिर्फ जंगल से तलाशने के बजाय खेतों में उगाने पर जोर है। वन विभाग और उत्तराखंड जड़ी-बूटी बोर्ड के मुताबिक स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण देकर जड़ी-बूटी की खेती, प्रसंस्करण और पैकेजिंग से जोड़ने की तैयारी है, ताकि गांवों में ही अधिक से अधिक मूल्यवर्धन हो सके।

सरकारी स्तर पर आयुर्वेद और आयुष क्षेत्र को बढ़ावा मिलने के बाद औषधीय पौधों की मांग में लगातार इजाफा हुआ है। दवाओं के अलावा इन पौधों का इस्तेमाल कॉस्मेटिक्स, हर्बल चाय और खाद्य पूरक बनाने में भी होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गांवों में ही गुणवत्ता वाला उत्पाद तैयार हो और उसे सही बाजार मिले तो इस क्षेत्र से जुड़े परिवारों की आमदनी में काफी वृद्धि हो सकती है।

आजीविका के नए रास्ते

  • जड़ी-बूटी संग्रह से जुड़े परिवारों को सही कीमत दिलाना
  • खेती और नर्सरी से पलायन रोकने में मदद
  • स्वयं सहायता समूहों के जरिए प्रसंस्करण और पैकेजिंग
  • शोध और नर्सरी में स्थानीय स्तर पर रोजगार

जंगल से जड़ी-बूटी का संग्रह आमतौर पर गर्मियों के बाद होता है, जब ऊंचाई पर बर्फ पिघलती है और पौधों के जड़-कंद तैयार होते हैं। संग्रह करने वाले लोगों का कहना है कि सही समय और सही तरीके की जानकारी के बिना संग्रह से अच्छी कीमत नहीं मिलती।

जटामांसी संकट में

विशेषज्ञों का कहना है कि अंधाधुंध संग्रह और अवैध तस्करी से कई दुर्लभ पौधे संकट में हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हिमालयन जटामांसी विलुप्ति की कगार पर बताई जाती है। इसीलिए वैज्ञानिक तरीके से संग्रह, संरक्षण और खेती पर जोर दिया जा रहा है, ताकि पौधे भी बचें और लोगों की आमदनी का जरिया भी कायम रहे। कुछ प्रजातियों के संग्रह पर पाबंदी भी है, इसलिए नियमों के अंदर रहकर कारोबार करना ही फायदेमंद माना जाता है।

पलायन रोकने में योगदान

वन विभाग और जड़ी-बूटी बोर्ड की मानें तो जड़ी-बूटी आधारित आजीविका से गांवों में रोजगार के अवसर बनेंगे। उम्मीद है कि इससे पलायन रुकने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। पहाड़ से पलायन उत्तराखंड की बड़ी चुनौती है, ऐसे में जड़ी-बूटियों का यह खजाना गांवों में ही रोजगार देने की स्थायी संभावना भर सकता है।